शुक्रवार, 19 जून 2026

नौकरी

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खुशियाँ जाने वह कहाँ चली गई।

बस नौकरी याद आती है।

दिन - रात दिल परेशान होता, सपने में बॉस की डांट सुनाई देती हैं।।

क्या कहूँ कुछ समझ न आता, मन ऐसे विकल हुआ जाता है।

पैसे से तो सामान मिल ही जाती हैं, बस खुशियाँ कहां से लाऊँ।

जब नौकरी नहीं तब भी परेशान और जब है तब भी।

कभी सपने नहीं तो सभी  अपने नहीं।



शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

मन की इच्छा

आज मन चुपचाप यह विचार करता है,
नगर-जीवन में कितना अधूरापन भरता है।
न वह प्रभात की मंद-मंद बयार है,
न खेतों पर पलाश-सा सजा श्रृंगार है,
न सुकून कहीं, न शांति का एहसास,
बस दौड़ती ज़िंदगी, थकते हर श्वास।
मंज़िल का कोई ठिकाना नज़र नहीं आता,
भागते-भागते जीवन ही खो जाता।
न देखी खेतों की हरितिमा हरी-भरी,
न सुनी चिड़ियों की मधुर तान प्यारी,
न वन में स्वच्छंद विचरते जीवों का मान,
हमने बाँध दिए सब, बना दिए मेहमान।
क्षणिक सुख की चाह में भटकते रहते हैं,
चिड़ियाघरों में ही खुशियाँ गिनते रहते हैं।
मन यह सब अपलक निहारता जाता है,
सच से जैसे खुद को दूर बनाता है।
गाँव के खेत पड़े हैं सूने-बंजर,
और हम बालकनी में उगा रहे हैं अंजर-पंजर।
चूल्हे की सोंधी खुशबू अब भाती नहीं,
गैस की चाय में भी कोई कमी नहीं।
जहाँ सच्ची खुशी थी, उसे छोड़ आए,
उसे पाने की चाह में जीवन गंवाए।
अंत में न सुख बचता, न जीवन का सार,
बस बीत जाती उम्र यूँ ही बार-बार।
और जब सब कुछ पीछे छूट जाता है,
मन गाँव की माटी को ही पुकारता है।
सोंधी खुशबू पाने की चाह लिए,
• प्राण भी अंततः शरीर से विदा लिए।

नौकरी

, खुशियाँ जाने वह कहाँ चली गई। बस नौकरी याद आती है। दिन - रात दिल परेशान होता, सपने में बॉस की डांट सुनाई देती हैं।। क्या कहूँ कुछ समझ न आता...